Love with Astrology-acharya satish ji

Love with Astrology-acharya satish ji Love with Astrology-acharya satish ji india's first voice reader and also face reader and love & relationship expert. A PHD from the well known Banaras Hindu University, Acharya Satish Awasthi belongs to a Brahmin family and has devoted much of his time to the understanding of Astrology and Spirituality. He is also proficient in the Sanskrit language. Acharya Satish Awasthi has been helping people solve problems, especially those of love and marriage in their life through powerful astrological remedies since the past 15 years. Career and business guidance, horoscope analysis, match making, foreign travel and finance are some other areas of his expertise. In the past, he had been an astrologer to Atal Bihari Vajpayee and was also appointed to perform a Mahakal Yagya in Lucknow on the event of the ex Prime Ministers Birthday, which was attended by some famous names in politics. In addition, Acharya Satish Awasthi has also been an advisor to the likes of Manoj Tiwari and Sonu Nigam. His accomplishments as an Astrologer do not end here-he was the lead advisor for Maharishi Mahesh Yogi Vedic Sciences Panel and has contributed to various newspapers including Hindustan Times, The High Time Express, Dainik Jagran, Sahara, Aaj and magazines like Madhurima , Ghranadini and Flimi Pariya. Also he is columnist in INEXT and Hindustan News Paper for Daily Rashiphal. Besides this, he has also featured on news channels and radio stations -Sahara Samay , Rastramat Sahara UP, Etv UP, Aastha, Zee Jagran, Shraddha, Maharishi, Sadhana and Pragya , Careworld, Jan Sandesh, Channel One, Magic and 92.7 FM. You can also read your Rashiphal given by Acharya Ji in Dainik Jagran & Hindustan Newspaper. Catch Acharya Ji in Channel Sony Sab from 07:00 AM to 07:24 AM.
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Love with Astrology-acharya satish ji india's first voice reader and also face reader and love & relationship expert.

A PHD from the well known Banaras Hindu University, Acharya Satish Awasthi belongs to a Brahmin family and has devoted much of his time to the understanding of Astrology and Spirituality. He is also proficient in the Sanskrit language. Acharya Satish Awasthi has been helping people solve problems, especially those of love and marriage in their life through powerful astrological remedies since the past 15 years. Career and business guidance, horoscope analysis, match making, foreign travel and finance are some other areas of his expertise. In the past, he had been an astrologer to Atal Bihari Vajpayee and was also appointed to perform a Mahakal Yagya in Lucknow on the event of the ex Prime Ministers Birthday, which was attended by some famous names in politics. In addition, Acharya Satish Awasthi has also been an advisor to the likes of Manoj Tiwari and Sonu Nigam. His accomplishments as an Astrologer do not end here-he was the lead advisor for Maharishi Mahesh Yogi Vedic Sciences Panel and has contributed to various newspapers including Hindustan Times, The High Time Express, Dainik Jagran, Sahara, Aaj and magazines like Madhurima , Ghranadini and Flimi Pariya. Also he is columnist in INEXT and Hindustan News Paper for Daily Rashiphal. Besides this, he has also featured on news channels and radio stations -Sahara Samay , Rastramat Sahara UP, Etv UP, Aastha, Zee Jagran, Shraddha, Maharishi, Sadhana and Pragya , Careworld, Jan Sandesh, Channel One, Magic and 92.7 FM. You can also read your Rashiphal given by Acharya Ji in Dainik Jagran & Hindustan Newspaper. Catch Acharya Ji in Channel Sony Sab from 07:00 AM to 07:24 AM.

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भगवान भोलेनाथ की “अष्टमूर्तियाँ ”
भगवान शिव के विश्वात्मक रूप ने ही चराचर जगत को धारण किया है|

यही अष्टमूर्तियाँ क्रमश: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, जीवात्मा सूर्य और चन्द्रमा को अधिष्ठित किये हुए हैं।

किसी एक मूर्ति की पूजा- अर्चना से सभी मूर्तियों की पूजा का फल मिलता है।

1. शर्व, 2. भव, 3. रूद्र , 4. उग्र, 5. भीम, 6. पशुपति, 7. महादेव , 8. ईशान

मनुष्यों के शरीर में अष्ट मूर्तियों का निवास:—

1. आँखों में “रूद्र” नामक मूर्ति प्रकाशरूप है| जिससे प्रणी देखता है।

२. “भव” ऩामक मूर्ति अन्न पान करके शरीर की वृद्धि करती है| यह स्वधा कहलाती है।

3.“शर्व” नामक मूर्ती अस्थिरूप से आधारभूता है |यह आधार शक्ति ही गणेश कहलाती है।

4. “ईशान” शक्ति प्राणापन – वृत्ति को प्राणियों में जीवन शक्ती है।

5.“पशुपति” मूर्ति उदर में रहकर अशित- पीत को पचाती है| जिसे जठराग्नि कहा जाता है।

६. “भीमा” मूर्ति देह में छिद्रों का कारण है।

7.“उग्र” नामक मूर्ति जीवात्मा के ऐश्वर्य रूप में रहती है।

8. “महादेव” नामक मूर्ति संकल्प रूप से प्राणियों के मन में रहती है ।

इस संकल्प रूप चन्द्रमा के लिए ” नवो नवो भवति जायमान: ” कहा गया है, अर्थात संकल्पों के नये नये रूप बदलते हैं।

अष्टमूर्तियों के तीर्थ स्थल:-

1– सूर्य :– सूर्य ही दृश्यमान प्रत्यक्ष देवता हैं|

सूर्य और शिव में कोई अन्तर नही है, सभी सूर्य मन्दिर वस्तुत: शिव मन्दिर ही हैं| फिर भी काशीस्थ ” गभस्तीश्वर ” लिंग सूर्य का शिव स्वरूप है|

2– चन्द्र:- सोमनाथ का मन्दिर है|
3– यजमान:- नेपालका पशुपतिनाथ मन्दिर है|

4– क्षिति लिंग:– तमिलनाडु के शिव कांची में स्थित आम्रकेश्वर हैं|

5– जल लिंग:– तमिलनाडु के त्रिचिरापल्ली में जम्बुकेश्वर मन्दिर है |

6– तेजो लिंग:- अरूणांचल पर्वत पर है|

7– वायु लिंग:– आन्ध्रप्रदेश के अरकाट जिले में कालहस्तीश्वर वायु लिंग है|

8– आकाश लिंग:– तमिलनाडु के चिदम्बरम् मे स्थित है| पंचगव्य से तेरा अभिषेक करूँ ... शीतल भयों संसार ... भोले भोले करता जगत .. आया #शिवमयसोमवार !

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भगवान् शिवजी जगत् के गुरू हैं, सर्व प्रथम शिवजी ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है, हम जैसी कल्पना और विचार करते हैं, वैसे ही हो जाते हैं, शिवजी ने इस आधार पर ध्यान की कई विधियों का विकास किया, भगवान् शिवजी दुनिया के सभी धर्मों का मूल हैं, शिवजी के दर्शन दुनिया के हर धर्म और उनके ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है।

हजारों वर्ष पूर्व वराह काल की शुरुआत में जब देवी-देवताओं ने धरती पर कदम रखे थे, तब उस काल में धरती हिमयुग की चपेट में थी, उस दौरान भगवान् शंकरजी ने धरती के केंद्र कैलाश को अपना निवास स्थान बनाया, भगवान् विष्णु ने समुद्र को और ब्रह्मा ने नदी के किनारे को अपना स्थान बनाया था।

पुराण कहते हैं कि जहां पर शिवजी विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है, जो भगवान् विष्णुजी का स्थान है, शिवजी के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था, इन तीनों देवताओं से सब कुछ हो गया।

वैज्ञानिकों का मानना है कि तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है, और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था, फिर जब समुद्र हटा तो अन्य धरती का प्रकटन हुआ और इस तरह धीरे-धीरे जीवन भी फैलता गया, सर्वप्रथम भगवान् शिवजी ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिये उन्हें आदि देव भी कहा जाता है।

आदि का अर्थ प्रारंभ, शिव को आदिनाथ भी कहा जाता है, आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है, इस आदिश शब्द से ही आदेश शब्द बना है, नाथ साधु सम्प्रदाय के साधु जब एक-दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं- आदेश! भगवान् शिवजी के अलावा ब्रह्मा और विष्णु ने संपूर्ण धरती पर जीवन की उत्पत्ति और पालन का कार्य किया।

सभी ने मिलकर धरती को रहने लायक बनाया और यहां देवता, दैत्य, दानव, गंधर्व, यक्ष और मनुष्य की आबादी को बढ़ाया, ऐसी मान्यता है कि महाभारत काल तक देवता धरती पर रहते थे, महाभारत के बाद सभी अपने-अपने धाम चले गयें, कलयुग के प्रारंभ होने के बाद देवता बस विग्रह रूप में ही रह गयें, अत: उनके विग्रहों की पूजा की जाती है।

वैदिक काल के रुद्र और उनके अन्य स्वरूप तथा जीवन दर्शन को पुराणों में विस्तार मिला, वेद जिन्हें रुद्र कहते हैं, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं, वराह काल के पूर्व के कालों में भी शिव थे। उन कालों की शिव की गाथा अलग है, देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी, ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे।

दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिवजी के समक्ष झुक गयें, इसीलिये शिवजी हैं देवों के देव महादेव, भगवान् शिवजी दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं, धर्म ग्रन्थों के अनुसार सतयुग में विशालकाय मानव हुआ करते थे, बाद में त्रेतायुग में इनकी प्रजाति नष्ट हो गई।

पुराणों के अनुसार पृथ्वी पर दैत्य, दानव, राक्षस और असुरों की जाति का अस्तित्व था, जो इतनी ही विशालकाय हुआ करते थे, ब्रह्माजी ने मनुष्यों में शांति स्थापित करने के लिए विशेष आकार के मनुष्यों की रचना की थी, विशेष आकार के मनुष्यों की रचना एक ही बार हुई थी, ये लोग काफी शक्तिशाली होते थे और पेड़ तक को अपनी भुजाओं से उखाड़ सकते थे।

लेकिन इन लोगों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और आपस में लड़ने के बाद देवताओं को ही चुनौती देने लगे, अंत में भगवान् शंकरजी ने सभी को मार डाला और उसके बाद ऐसे लोगों की रचना फिर नहीं की गई, भगवान शिवजी ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे।

ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो, यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था, इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था, इस धनुष का नाम पिनाक था, देवी-देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवरात को सौंप दिया गया था, उल्लेखनीय है कि राजा दक्ष के यज्ञ में यज्ञ का भाग शिव को नहीं देने के कारण भगवान् शंकरजी बहुत क्रोधित हो गये थे।

और उन्होंने सभी देवताओं को अपने पिनाक धनुष से नष्ट करने की ठानी, एक टंकार से धरती का वातावरण भयानक हो गया, बड़ी मुश्किल से उनका क्रोध शांत किया गया, तब उन्होंने यह धनुष देवताओं को दे दिया, देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवरात को दे दिया, राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवरात थे, शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था।

इस धनुष को भगवान् शंकरजी ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था, उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था, लेकिन प्रभु रामजी ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया, चक्र को छोटा, लेकिन सबसे अचूक अस्त्र माना जाता था, सभी देवी-देवताओं के पास अपने-अपने अलग-अलग चक्र होते थे।

उन सभी के अलग-अलग नाम थे, शंकरजी के चक्र का नाम भवरेंदु, विष्णुजी के चक्र का नाम कांता चक्र और देवी का चक्र मृत्यु मंजरी के नाम से जाना जाता था, सुदर्शन चक्र का नाम भगवान कृष्ण के नाम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है, यह बहुत कम ही लोग जानते हैं कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान् शंकरजी ने किया था, प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्रों के अनुसार इसका निर्माण भगवान् शंकरजी ने ही किया था।

निर्माण के बाद भगवान् शिवजी ने इसे श्रीविष्णु को सौंप दिया था, जरूरत पड़ने पर श्रीविष्णु ने इसे देवी पार्वतीजी को प्रदान कर दिया, पार्वतीजी ने इसे परशुरामजी को दे दिया, और भगवान कृष्ण को यह सुदर्शन चक्र परशुरामजी से मिला, इस तरह भगवान शिव के पास कई अस्त्र-शस्त्र थे लेकिन उन्होंने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र देवताओं को सौंप दियें।

उनके पास सिर्फ एक त्रिशूल ही होता था, यह बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था, त्रिशूल तिन प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक है, इसमें तीन तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम, वैज्ञानिक भाषा में इसे प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन कहते हैं, इसके अलावा पाशुपतास्त्र भी शिवजी का अस्त्र है।

भगवान् शिवजी को नागवंशियों से घनिष्ठ लगाव था, नाग कुल के सभी लोग शिवजी के क्षेत्र हिमालय में ही रहते थे, कश्मीर का अनंतनाग इन नागवंशियों का गढ़ था, नागकुल के सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे, नागों के प्रारंभ में पाँच कुल हुआ करते थे- शेषनाग यानी अनंत, वासुकी, तक्षक, पिंगला और कर्कोटक, ये शोध के विषय हैं कि ये लोग सर्प थे या मानव या आधे सर्प और आधे मानव?

हालांकि इन सभी को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है तो निश्चिरत ही ये मनुष्य नहीं होंगे, नाग वंशावलियों में शेषनाग को नागों का प्रथम राजा माना जाता है, शेषनाग को ही अनंत नाम से भी जाना जाता है, ये भगवान श्रीविष्णु के सेवक थे, इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुयें, जो शिवजी के सेवक बने, फिर तक्षक और पिंगला ने राज्य संभाला, वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था।

मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला यानी तक्षशिला नामक नगरी बसाकर अपने नाम से तक्षक कुल चलाया था, उक्त पांचों नाग वंश की गाथायें पुराणों में पाई जाती हैं, उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादि नाम से नागों के वंश हुयें, जिनके पृथ्वी के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था।

शिवजी ने अपनी अर्धांगिनी पार्वतीजी को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया, उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखायें हो चली हैं, वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है, ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बतायें गये एक सौ बारह ध्यान सूत्रों का संकलन है, योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान् शिवजी के विज्ञान भैरव तंत्र और शिव संहिता में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुयीं है।

तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है, भगवान् शिवजी के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं, इसी की एक शाखा हठयोग की है, भगवान् शिवजी कहते हैं- "वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:" अर्थात वाम मार्ग अत्यंत गहन है और योगियों के लिये भी अगम्य है, इस प्रकार शिवजी की भक्ति और पूजा से सांसारिक सभी व्याधियां समाप्त हो जाती है।
#शिवमयसोमवार

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शिवरात्री विशेष मे-
*************
विध्वन्सकारी नही है, महादेव(आशुतोष) का डमरु।

अवश्य ही आपने भगवान शंकर की प्रतिमा को ध्यान से देखा होगा! महादेव एक हाथ मे डमरु थामे रहते है! पर क्या कभी आपने इस बात पर गौर किया कि ऐसा क्यो.?
इस वाध्य यंत्र को धारण करने के पीछे भगवान का आशय क्या हो सकता है? क्या यह वाध्य-यंत्र भगवान शिव की मात्र शोभा बढाने वाला अलंकार है.?आखिर भगवान आशुतोष के हाथ मे डमरु का क्या प्रयोजन.? क्या यह मात्र एक डुगडुगी है, जो 'तांडव' करते महादेव के हाथ मे सुशोभित होती है? या इस डमरु का बजना किसी विध्वन्स की और इशारा करता है? विचारिए, भगवान शंकर मदारी तो नही, फ़िर हाथ मे डमरु क्यों थामा? उतर गूढ है और आध्यात्मीक भी।

सृष्टि की रचना' और 'विश्व शांति के
सर्जन' मे डमरु की भूमिका-

प्राचीन समय मे भारत और तिब्बत के साधु-संत नर-खोपडीयो के ऊपरी भाग की हड्डी से डमरु के दोनो सिरो को बनाते थे! वे ऐसा इसलिए करते थे, क्योंकि शास्त्रो के अनुसार हमारे मस्तक के शिरो-भाग मे ब्रह्मनाद की तरंगे निरंतर गुंजायमान रहती है!

सो प्रतीक के तौर पर वे नर-खोपडी के ऊपरी भाग से बने डमरु को बजाते थे, ताकि समस्त जन को यह संदेश पहुँच सके कि हम सबके भीतर भी महादेव(आशुतोष) का डमरु बज रहा है! यह शिव का डमरु 'ब्रह्मनाद' का ध्योतक है! इस ब्रह्मनाद का वर्णन वेद-उपनिषद आदि सभी ग्रंथो मे गुंजायमान है-

इमे मयूखा उपसेदुरु सद:
सामानि चक्रूस्तसराणयोतवे!
(ऋगवेद.- 10-130-2)

अर्थात परमात्मा से सूक्ष्म तरंगे अथवा ब्रह्मनाद प्रकट हुआ, जिससे भिन्न-भिन्न पदार्थो का निर्माण आरम्भ हो गया! श्री गुरू ग्रंथ साहिब मे भी वरणत है-

सबदे धरती सबदे आगास,
सबदे सबदि भइआ परगास!

अर्थआत ब्रह्मनाद रूप शब्द से ही धरती बनी, आकाश बना सृष्टि के प्रत्येक रचना मे इसी नाद की तरंग है! संत वेमना तेलुगु भाषा मे कहते है-

नादु नादु कूडि नामरुपं बैन!
***************
अर्थात नाद ही इस सकल नामरूप जगत का आधार है! अत: डमरु से प्रस्फुटित ब्रह्मनाद सृष्टि के स्रजन का कारक है! इस तथ्य से हम इस निश्कर्ष पर पहुँचते है कि महादेव का डमरु विध्वन्सकारी नही, विध्वन्सहारी है, स्रजनकारी है!

इसके अतिरिक्त गुरूदेव श्री आशुतोष महाराज जी भी 'ब्रह्मनाद' के विषय मे अक्सर यह उपनिषदीय श्लोक उद्दत करते है-

दृष्टि: स्थिरा यस्य विना सदृश्यं!
वायु: स्थिरो यस्य विना प्रयत्नं!
चितं स्थिरं यस्य विनावलम्बम!
स ब्रह्मतारंतरनादरूप:!!

अर्थात वैसे तो हमारी दृष्टि किसी सुंदर दृश्य पर स्थिर होती है; परन्तु नादब्रह्म बिना सदृश्य के ही हमारी दृष्टि को केन्द्रित कर स्थिर कर देता है! वैसे तो योग-प्राणयाम के सतत प्रयत्नो द्वारा हमारे प्राण स्थिर हो पाते है; परन्तु नादब्रह्म बिना प्रयत्नो के ही हमारे प्राणो को स्थिरता दे देता है! वैसे तो, किसी न किसी अवलम्बन या आधार की मदद से हमारा मन या चित स्थिर हो पाता है; परन्तु नादब्रह्म बिना किसी अन्य सहारे के हमारे चित मे यह अथवा ठहराव ले आता है! यह नादरूप मे साक्षात ब्रह्म ही हमारे स्पन्दित होता है!

इस श्लोक को उद्दत कर श्री महाराज जी समझाते है- जो ब्रह्म नाद इस सृष्टि की रचना कर सकता है, अत्यन्त सरलता से मानव मन को शान्त और स्थिर कर सकता है-
क्या वह मानवीय जीवन का नव-निर्माण या हमारे जीवन को शांत व स्थिर नही कर सकता..? अवश्य कर सकता है और करता भी है!
दरअसल, नादब्रह्म की प्रबल, अचूक और स्रजनकारी शक्ति ही मानव-समाज या विश्व का सुनिर्माण व सुविकास कर सकती है! बस, शर्त यही है कि आप एक पूर्ण गुरू से ब्रह्मज्ञान मे दिक्षीत हो! फिर उसी दीक्षा के द्वारा ब्रह्मनाद आपके अंतर्घट मे प्रकट हो पाएगा! आप ब्रह्मनाद को ध्यान की शाश्वत विधि के द्वारा श्रवण करने मे सक्षम हो पाएंगे!

सारत: भगवान शिव(आशुतोष) का डमरु कोई प्रलय या विनाश की और इशारा नही करता! यह अंतर्जगत का ब्रह्मनाद है! यह प्रतीक है, शुभ, मंगलमय, दिव्य व सूक्ष्म श्रजन नवीनीकरण, विकास व उत्पति का!
आओ हम भी चले पूर्ण गुरू की शरण ब्रह्मज्ञान ले ईश्वर-दर्शन कर ले!

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महामृत्युंजय मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि
वशिष्ठ के अनुसार 33 कोटि(प्रकार) देवताओं के द्योतक हैं
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।
इन तैंतीस कोटि देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है

मंत्र इस प्रकार है

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
महामृत्युंजय मंत्र ( संस्कृत: महामृत्युंजय मंत्र

"मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र") जिसे त्रयंबकम मंत्र भी कहा जाता है, ऋग्वेद का एक श्लोक है।
यह त्रयंबक "त्रिनेत्रों वाला", रुद्र का विशेषण (जिसे बाद में शिव के साथ जोड़ा गया)को संबोधित है।
यह श्लोक यजुर्वेद में भी आता है।
गायत्री मंत्र के साथ यह समकालीन हिंदू धर्म का सबसे व्यापक रूप से जाना जाने वाला मंत्र है।
शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है।
इसे मृत्यु पर विजय पाने वाला महा मृत्युंजय मंत्र कहा जाता है।
इस मंत्र के कई नाम और रूप हैं।
इसे शिव के उग्र पहलू की ओर संकेत करते हुए रुद्र मंत्र कहा जाता है;
शिव के तीन आँखों की ओर इशारा करते हुए त्रयंबकम मंत्र और इसे कभी कभी मृत-संजीवनी
मंत्र के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह कठोर तपस्या पूरी करने के बाद पुरातन ऋषि शुक्र को प्रदान की गई "जीवन बहाल" करने वाली विद्या
का एक घटक है।

ऋषि-मुनियों ने महा मृत्युंजय मंत्र को वेद का
ह्रदय कहा है।
चिंतन और ध्यान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सर्वोच्च स्थान है।
महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ
त्रयंबकम = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक)
यजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय
सुगंधिम= मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)
पुष्टि = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता
वर्धनम = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य, धन, सुख में) वृद्धिकारक;जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है,
एक अच्छा माली
उर्वारुकम= ककड़ी (कर्मकारक)
इव= जैसे, इस तरह
बंधना= तना (लौकी का); ("तने से" पंचम विभक्ति - वास्तव में समाप्ति द से अधिक लंबी है जो संधि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है)
मृत्युर = मृत्यु से
मुक्षिया = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें
मा= न
अमृतात= अमरता, मोक्

सरल अनुवाद
हम त्रि-नेत्रीय वास्तविकता का चिंतन करते हैं जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित करता है और वृद्धि करता है।
ककड़ी की तरह हम इसके तने से अलग ("मुक्त") हों, अमरत्व से नहीं बल्कि मृत्यु से हों।

||महा मृत्‍युंजय मंत्र ||
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्‍बकं
यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव
बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात्
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!
||महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ ||
''समस्‍त संसार के पालनहार, तीन नेत्र वाले शिव
की हम अराधना करते हैं।
विश्‍व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्‍यु
न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।''
महामृत्युंजय मंत्र के वर्णो (अक्षरों) का अर्थ महामृत्युंघजय मंत्र के वर्ण पद वाक्यक चरण
आधी ऋचा और सम्पुतर्ण ऋचा-इन छ: अंगों
के अलग-अलग अभिप्राय हैं।
ओम त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि
वशिष्ठर के अनुसार 33 कोटि(प्रकार) देवताओं
के घोतक हैं।
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।
इन तैंतीस कोटि देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु
तो प्राप्त करता ही हैं।
साथ ही वह नीरोग, ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है।
महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है।
भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।
त्रि – ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में
स्थित है।
यम – अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख
में स्थित है।
ब – सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण
कर्ण में स्थित है।
कम – जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम
कर्ण में स्थित है।
य – वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु
में स्थित है।
जा अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु
में स्थित है।
म – प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है,
जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
हे – प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
सु वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है।
दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
ग शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त्
अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
न्धिम् गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है।
बायें हाथ के मूल में स्थित है।
पु अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है।
बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
ष्टि – अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त
के मणिबन्धा में स्थित है।
व – पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है।
बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
र्ध – भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त
अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
नम् – कपाली रुद्र का घोतक है।
उरु मूल में
स्थित है।
उ दिक्पति रुद्र का घोतक है।
यक्ष जानु में स्थित है।
र्वा – स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष
गुल्फ् में स्थित है।
रु – भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष
पादांगुलि मूल में स्थित है।
क – धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
मि – अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो
वाम उरु मूल में स्थित है।
व – मित्र आदित्यद का घोतक है जो
वाम जानु में स्थित है।
ब – वरुणादित्या का बोधक है जो वाम
गुल्फा में स्थित है।
न्धा – अंशु आदित्यद का घोतक है।
वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
नात् – भगादित्यअ का बोधक है।
वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
मृ – विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि
में स्थित है।
र्त्यो् – दन्दाददित्य् का बोधक है।
वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।
मु – पूषादित्यं का बोधक है।
पृष्ठै भगा में स्थित है।
क्षी – पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है।
नाभि स्थिल में स्थित है।
य – त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है।
गुहय भाग में स्थित है।
मां – विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह
शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
मृ – प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग
में स्थित है।
तात् – अमित वषट्कार का घोतक है जो
हदय प्रदेश में स्थित है।
उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्तध देवता,
वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं।
जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग – अंग (जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं) उनकी रक्षा
होती है।
मंत्रगत पदों की शक्तियाँ जिस प्रकार मंत्रा में अलग अलग वर्णो (अक्षरों) की शक्तियाँ हैं। उसी प्रकार अलग – अल पदों की भी शक्तियाँ है।
त्र्यम्‍‍बकम् – त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है
जो सिर में स्थित है।
यजा सुगन्धात शक्ति का घोतक है जो ललाट में स्थित है।
महे माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है।
सुगन्धिम् – सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है।
पुष्टि – पुरन्दिरी शकित का द्योतक है जो मुख में स्थित है।
वर्धनम – वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है।
उर्वा – ऊर्ध्देक शक्ति का द्योतक है जो ह्रदय में स्थित है।
रुक – रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है।
मिव रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है।
बन्धानात् – बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है।
मृत्यो: – मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है।
मुक्षीय – मुक्तिकरी शक्तिक का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है।
मा – माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोंनों जंघाओ में स्थित है।
अमृतात – अमृतवती शक्तिका द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।

महामृत्युजय प्रयोग के लाभ :-
कलौकलिमल ध्वंयस सर्वपाप हरं शिवम्।
येर्चयन्ति नरा नित्यं तेपिवन्द्या यथा शिवम्।।
स्वयं यजनित चद्देव मुत्तेमा स्द्गरात्मवजै:।
मध्यचमा ये भवेद मृत्यैतरधमा साधन क्रिया।।
देव पूजा विहीनो य: स नरा नरकं व्रजेत।
यदा कथंचिद् देवार्चा विधेया श्रध्दायान्वित।।
जन्मचतारात्र्यौ रगोन्मृदत्युतच्चैरव विनाशयेत्।
कलियुग में केवल शिवजी की पूजा फल देने
वाली है।
समस्त पापं एवं दु:ख भय शोक आदि का हरण
करने के लिए महामृत्युजय की विधि ही श्रेष्ठ है।
ॐ नमः शिवाय

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बिल्व वृक्ष & शिवरात्री

1. बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते ।
2. अगर किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर
गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है ।
3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता
सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है ।
4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला
परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल
मिलता है ।
5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल
वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।
6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता
है।
7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।
8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट
लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि
स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे ।
10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी
शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त
हो जाते है ।
11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव
से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।
कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाये । बिल्व पत्र के लिए पेड़
को क्षति न पहुचाएं ।

🔸शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को कौन सी चीज़ चढाने से
मिलता है क्या फल ?

1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।
2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।
3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।
4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान
को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए।

🔸शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस
(द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है
1. ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से
शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी
जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।
2. नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक
करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो
उसकी समस्या का निदान संभव है।
3. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को
चढ़ाएं।
4. सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में
वृद्धि होती है।
5. शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों
की प्राप्ति होती है।
6. शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति
होती है।
7. मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा
(टीबी) रोग में आराम मिलता है।

🔸शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल
चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है
1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने
पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।
2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।
3. अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान
विष्णु को प्रिय होता है।
4. शमी पत्रों (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।
5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती
है।
6. जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की
कमी नहीं होती।
7. कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।
8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि
होती है।
9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र
प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशनकरता है।
10. लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है।
11. दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

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भगवान भोलेनाथ की “अष्टमूर्तियाँ ”
भगवान शिव के विश्वात्मक रूप ने ही चराचर जगत को धारण किया है|

यही अष्टमूर्तियाँ क्रमश: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, जीवात्मा सूर्य और चन्द्रमा को अधिष्ठित किये हुए हैं।

किसी एक मूर्ति की पूजा- अर्चना से सभी मूर्तियों की पूजा का फल मिलता है।

1. शर्व, 2. भव, 3. रूद्र , 4. उग्र, 5. भीम, 6. पशुपति, 7. महादेव , 8. ईशान

मनुष्यों के शरीर में अष्ट मूर्तियों का निवास:—

1. आँखों में “रूद्र” नामक मूर्ति प्रकाशरूप है| जिससे प्रणी देखता है।

२. “भव” ऩामक मूर्ति अन्न पान करके शरीर की वृद्धि करती है| यह स्वधा कहलाती है।

3.“शर्व” नामक मूर्ती अस्थिरूप से आधारभूता है |यह आधार शक्ति ही गणेश कहलाती है।

4. “ईशान” शक्ति प्राणापन – वृत्ति को प्राणियों में जीवन शक्ती है।

5.“पशुपति” मूर्ति उदर में रहकर अशित- पीत को पचाती है| जिसे जठराग्नि कहा जाता है।

६. “भीमा” मूर्ति देह में छिद्रों का कारण है।

7.“उग्र” नामक मूर्ति जीवात्मा के ऐश्वर्य रूप में रहती है।

8. “महादेव” नामक मूर्ति संकल्प रूप से प्राणियों के मन में रहती है ।

इस संकल्प रूप चन्द्रमा के लिए ” नवो नवो भवति जायमान: ” कहा गया है, अर्थात संकल्पों के नये नये रूप बदलते हैं।

अष्टमूर्तियों के तीर्थ स्थल:-

1– सूर्य :– सूर्य ही दृश्यमान प्रत्यक्ष देवता हैं|

सूर्य और शिव में कोई अन्तर नही है, सभी सूर्य मन्दिर वस्तुत: शिव मन्दिर ही हैं| फिर भी काशीस्थ ” गभस्तीश्वर ” लिंग सूर्य का शिव स्वरूप है|

2– चन्द्र:- सोमनाथ का मन्दिर है|
3– यजमान:- नेपालका पशुपतिनाथ मन्दिर है|

4– क्षिति लिंग:– तमिलनाडु के शिव कांची में स्थित आम्रकेश्वर हैं|

5– जल लिंग:– तमिलनाडु के त्रिचिरापल्ली में जम्बुकेश्वर मन्दिर है |

6– तेजो लिंग:- अरूणांचल पर्वत पर है|

7– वायु लिंग:– आन्ध्रप्रदेश के अरकाट जिले में कालहस्तीश्वर वायु लिंग है|

8– आकाश लिंग:– तमिलनाडु के चिदम्बरम् मे स्थित है| पंचगव्य से तेरा अभिषेक करूँ ... शीतल भयों संसार ... भोले भोले करता जगत .. आया #शिवमयसोमवार !

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विजया एकादशी : व्रत विधि आरती एवं प्रामाणिक व्रत कथा

धर्मराज युधिष्‍ठिर बोले - हे जनार्दन! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है तथा उसकी विधि क्या है? कृपा करके आप मुझे बताइए।

श्री भगवान बोले हे राजन् - फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष एकादशी का नाम विजया एकादशी है। इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्‍य को विजय प्राप्त‍ होती है। यह सब व्रतों से उत्तम व्रत है। इस विजया एकादशी के महात्म्य के श्रवण व पठन से समस्त पाप नाश को प्राप्त हो जाते...हैं। एक समय देवर्षि नारदजी ने जगत् पिता ब्रह्माजी से कहा महाराज! आप मुझसे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी विधान कहिए।

ब्रह्माजी कहने लगे कि हे नारद! विजया एकादशी का व्रत पुराने तथा नए पापों को नाश करने वाला है। इस विजया एकादशी की विधि मैंने आज तक किसी से भी नहीं कही। यह समस्त मनुष्यों को विजय प्रदान करती है।

एकादशी जी की आरती

इसकी कथा के अनुसार त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्रजी को जब चौदह वर्ष का वनवास हो गया, तब वे श्री लक्ष्मण तथा सीताजी सहित पंचवटी में निवास करने लगे। वहां पर दुष्ट रावण ने जब सीताजी का हरण ‍किया तब इस समाचार से श्री रामचंद्रजी तथा लक्ष्मण अत्यंत व्याकुल हुए और सीताजी की खोज में चल दिए।

घूमते-घूमते जब वे मरणासन्न जटायु के पास पहुंचे तो जटायु उन्हें सीताजी का... वृत्तांत सुनाकर स्वर्गलोक चला गया। कुछ आगे जाकर उनकी सुग्रीव से मित्रता हुई और बाली का वध किया। हनुमानजी ने लंका में जाकर सीताजी का पता लगाया और उनसे श्री रामचंद्रजी और सुग्रीव की‍ मित्रता का वर्णन किया। वहां से लौटकर हनुमानजी ने भगवान राम के पास आकर सब समाचार कहे।

एकादशी और प्रदोष व्रत का चमत्कारिक लाभ, जानिए...

मुनि ने भी उनको मनुष्य रूप धारण किए हुए पुराण पुरुषोत्तम समझकर उनसे पूछा कि हे राम! आपका आना कैसे हुआ? रामचंद्रजी कहने लगे कि हे ऋषे! मैं अपनी सेना ‍सहित यहां आया हूं और राक्षसों को जीतने के लिए लंका जा रहा हूं। आप कृपा करके समुद्र पार करने का कोई उपाय बतलाइए। मैं इसी कारण आपके पास आया हूं। वकदालभ्य ऋषि बोले कि हे राम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का उत्तम व्रत करने से निश्चय ही आपकी विजय होगी, साथ ही आप समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे। इस व्रत की विधि यह है कि दशमी के दिन स्वर्ण, चांदी, तांबा या मिट्‍टी का एक घड़ा बनाएं। उस घड़े को जल से भरकर तथा पांच पल्लव रख वेदिका पर स्थापित करें। उस घड़े के नीचे सतनजा और ऊपर जौ रखें। उस पर श्रीनारायण भगवान की स्वर्ण की मूर्ति स्थापित करें। एका‍दशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान की पूजा करें। तत्पश्चात घड़े के सामने बैठकर दिन व्यतीत करें ‍और रात्रि को भी उसी प्रकार बैठे रहकर जागरण करें। द्वादशी के दिन नित्य नियम से निवृत्त होकर उस घड़े को ब्राह्मण को दे दें। हे राम! यदि तुम भी इस व्रत को सेनापतियों सहित करोगे तो तुम्हारी विजय अवश्य होगी। श्री रामचंद्रजी ने ऋषि के कथनानुसार इस व्रत को किया और इसके प्रभाव से दैत्यों पर विजय पाई। अत: हे राजन्! जो कोई मनुष्य विधिपूर्वक इस व्रत को करेगा, दोनों लोकों में उसकी अवश्य विजय होगी। श्री ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था कि हे पुत्र! जो कोई इस व्रत के महात्म्य को पढ़ता या सुनता है, उसको वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

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उमा-शिव विवाह कथा
यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं।
कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥
सती के विरह में शंकरजी की दयनीय दशा हो गई। वे चिरसमाधि में लीन हो गए थे। उधर सती ने भी शरीर का त्याग करते समय संकल्प किया था कि मैं राजा हिमालय के यहाँ जन्म लेकर शंकरजी की अर्द्धांगिनी बनूँ।
अब जगदम्बा का संकल्प व्यर्थ होने से तो रहा। वे उचित समय पर राजा हिमालय की पत्नी मेनका के गर्भ में प्रविष्ट होकर उनकी कोख में से प्रकट हुईं। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण वे 'पार्वती' कहलाईं। जब पार्वती बड़ी होकर सयानी हुईं तो उनके माता-पिता को अच्छा वर तलाश करने की चिंता सताने लगी।
एक दिन अचानक देवर्षि नारद राजा हिमालय के महल में आ पहुँचे और पार्वती को देख कहने लगे कि इसका विवाह शंकरजी के साथ होना चाहिए और वे ही सभी दृष्टि से इसके योग्य हैं।
पार्वती के माता-पिता के आनंद का यह जानकर ठिकाना न रहा कि साक्षात जगन्माता सती ही उनके यहाँ प्रकट हुई हैं। वे मन ही मन भाग्य को सराहने लगे।
एक दिन अचानक भगवान शंकर सती के विरह में घूमते-घूमते उसी प्रदेश में जा पहुँचे और पास ही के स्थान गंगावतरण में तपस्या करने लगे। जब हिमालय को इसकी जानकारी मिली तो वे पार्वती को लेकर शिवजी के पास गए।
वहाँ राजा ने शिवजी से विनम्रतापूर्वक अपनी पुत्री को सेवा में ग्रहण करने की प्रार्थना की। शिवजी ने पहले तो आनाकानी की, किंतु पार्वती की भक्ति देखकर वे उनका आग्रह न टाल न सके।
शिवजी से अनुमति मिलने के बाद तो पार्वती प्रतिदिन अपनी सखियों को साथ ले उनकी सेवा करने लगीं। पार्वती हमेशा इस बात का सदा ध्यान रखती थीं कि शिवजी को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो।
वे हमेशा उनके चरण धोकर चरणोदक ग्रहण करतीं और षोडशोपचार से पूजा करतीं। इसी तरह पार्वती को भगवान शंकर की सेवा करते दीर्घ समय व्यतीत हो गया। किंतु पार्वती जैसी सुंदर बाला से इस प्रकार एकांत में सेवा लेते रहने पर भी शंकर के मन में कभी विकार नहीं हुआ।
वे सदा अपनी समाधि में ही निश्चल रहते। उधर देवताओं को तारक नाम का असुर बड़ा त्रास देने लगा। यह जानकर कि शिव के पुत्र से ही तारक की मृत्यु हो सकती है, सभी देवता शिव-पार्वती का विवाह कराने की चेष्टा करने लगे।
उन्होंने शिव को पार्वती के प्रति अनुरक्त करने के लिए कामदेव को उनके पास भेजा, किंतु पुष्पायुध का पुष्पबाण भी शंकर के मन को विक्षुब्ध न कर सका। उलटा कामदेव उनकी क्रोधाग्नि से भस्म हो गए।
इसके बाद शंकर भी वहाँ अधिक रहना अपनी तपश्चर्या के लिए अंतरायरूप समझ कैलास की ओर चल दिए। पार्वती को शंकर की सेवा से वंचित होने का बड़ा दुःख हुआ, किंतु उन्होंने निराश न होकर अब की बार तप द्वारा शंकर को संतुष्ट करने की मन में ठानी।
उनकी माता ने उन्हें सुकुमार एवं तप के अयोग्य समझकर बहुत मना किया, इसीलिए उनका 'उमा'- उ+मा (तप न करो)- नाम प्रसिद्ध हुआ। किंतु पार्वती पर इसका असर न हुआ। अपने संकल्प से वे तनिक भी विचलित नहीं हुईं। वे भी घर से निकल उसी शिखर पर तपस्या करने लगीं, जहाँ शिवजी ने तपस्या की थी।
तभी से लोग उस शिखर को 'गौरी-शिखर' कहने लगे। वहाँ उन्होंने पहले वर्ष फलाहार से जीवन व्यतीत किया, दूसरे वर्ष वे पर्ण (वृक्षों के पत्ते) खाकर रहने लगीं और फिर तो उन्होंने पर्ण का भी त्याग कर दिया और इसीलिए वे 'अपर्णा' कहलाईं।
इस प्रकार पार्वती ने तीन हजार वर्ष तक तपस्या की। उनकी कठोर तपस्या को देख ऋषि-मुनि भी दंग रह गए।
अंत में भगवान आशुतोष का आसन हिला। उन्होंने पार्वती की परीक्षा के लिए पहले सप्तर्षियों को भेजा और पीछे स्वयं वटुवेश धारण कर पार्वती की परीक्षा के निमित्त प्रस्थान किया।
जब इन्होंने सब प्रकार से जाँच-परखकर देख लिया कि पार्वती की उनमें अविचल निष्ठा है, तब तो वे अपने को अधिक देर तक न छिपा सके। वे तुरंत अपने असली रूप में पार्वती के सामने प्रकट हो गए और उन्हें पाणिग्रहण का वरदान देकर अंतर्धान हो गए।
पार्वती अपने तप को पूर्ण होते देख घर लौट आईं और अपने माता-पिता से सारा वृत्तांत कह सुनाया। अपनी दुलारी पुत्री की कठोर तपस्या को फलीभूत होता देखकर माता-पिता के आनंद का ठिकाना नहीं रहा।
उधर शंकरजी ने सप्तर्षियों को विवाह का प्रस्ताव लेकर हिमालय के पास भेजा और इस प्रकार विवाह की शुभ तिथि निश्चित हुई।
सप्तर्षियों द्वारा विवाह की तिथि निश्चित कर दिए जाने के बाद भगवान्‌शंकरजी ने नारदजी द्वारा सारे देवताओं को विवाह में सम्मिलित होने के लिए आदरपूर्वक निमंत्रित किया और अपने गणों को बारात की तैयारी करने का आदेश दिया।
उनके इस आदेश से अत्यंत प्रसन्न होकर गणेश्वर शंखकर्ण, केकराक्ष, विकृत, विशाख, विकृतानन, दुन्दुभ, कपाल, कुंडक, काकपादोदर, मधुपिंग, प्रमथ, वीरभद्र आदि गणों के अध्यक्ष अपने-अपने गणों को साथ लेकर चल पड़े।
नंदी, क्षेत्रपाल, भैरव आदि गणराज भी कोटि-कोटि गणों के साथ निकल पड़े। ये सभी तीन नेत्रों वाले थे। सबके मस्तक पर चंद्रमा और गले में नीले चिन्ह थे। सभी ने रुद्राक्ष के आभूषण पहन रखे थे। सभी के शरीर पर उत्तम भस्म पुती हुई थी।
इन गणों के साथ शंकरजी के भूतों, प्रेतों, पिशाचों की सेना भी आकर सम्मिलित हो गई। इनमें डाकनी, शाकिनी, यातुधान, वेताल, ब्रह्मराक्षस आदि भी शामिल थे। इन सभी के रूप-रंग, आकार-प्रकार, चेष्टाएँ, वेश-भूषा, हाव-भाव आदि सभी कुछ अत्यंत विचित्र थे।
किसी के मुख ही नहीं था और किसी के बहुत से मुख थे। कोई बिना हाथ-पैर के ही था तो कोई बहुत से हाथ-पैरों वाला था। किसी के बहुत सी आँखें थीं और किसी के पास एक भी आँख नहीं थी। किसी का मुख गधे की तरह, किसी का सियार की तरह, किसी का कुत्ते की तरह था।
उन सबने अपने अंगों में ताजा खून लगा रखा था। कोई अत्यंत पवित्र और कोई अत्यंत वीभत्स तथा अपवित्र गणवेश धारण किए हुए था। उनके आभूषण बड़े ही डरावने थे उन्होंने हाथ में नर-कपाल ले रखा था।
वे सबके सब अपनी तरंग में मस्त होकर नाचते-गाते और मौज उड़ाते हुए महादेव शंकरजी के चारों ओर एकत्रित हो गए।
चंडीदेवी बड़ी प्रसन्नता के साथ उत्सव मनाती हुई भगवान्‌रुद्रदेव की बहन बनकर वहाँ आ पहुँचीं। उन्होंने सर्पों के आभूषण पहन रखे थे। वे प्रेत पर बैठकर अपने मस्तक पर सोने का कलश धारण किए हुए थीं।
धीरे-धीरे वहाँ सारे देवता भी एकत्र हो गए। उस देवमंडली के बीच में भगवान श्री विष्णु गरुड़ पर विराजमान थे। पितामह ब्रह्माजी भी उनके पास में मूर्तिमान्‌वेदों, शास्त्रों, पुराणों, आगमों, सनकाद महासिद्धों, प्रजापतियों, पुत्रों तथा कई परिजनों के साथ उपस्थित थे।
देवराज इंद्र भी कई आभूषण पहन अपने ऐरावत गज पर बैठ वहाँ पहुँचे थे। सभी प्रमुख ऋषि भी वहाँ आ गए थे। तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहू आदि श्रेष्ठ गंधर्व तथा किन्नर भी शिवजी की बारात की शोभा बढ़ाने के लिए वहाँ पहुँच गए थे। इनके साथ ही सभी जगन्माताएँ, देवकन्याएँ, देवियाँ तथा पवित्र देवांगनाएँ भी वहाँ आ गई थीं।
इन सभी के वहाँ मिलने के बाद भगवान शंकरजी अपने स्फुटिक जैसे उज्ज्वल, सुंदर वृषभ पर सवार हुए। दूल्हे के वेश में शिवजी की शोभा निराली ही छटक रही थी।
इस दिव्य और विचित्र बारात के प्रस्थान के समय डमरुओं की डम-डम, शंखों के गंभीर नाद, ऋषियों-महर्षियों के मंत्रोच्चार, यक्षों, किन्नरों, गन्धर्वों के सरस गायन और देवांगनाओं के मनमोहक नृत्य और मंगल गीतों की गूँज से तीनों लोक परिव्याप्त हो उठे।
उधर हिमालय ने विवाह के लिए बड़ी धूम-धाम से तैयारियाँ कीं और शुभ लग्न में शिवजी की बारात हिमालय के द्वार पर आ लगी। पहले तो शिवजी का विकट रूप तथा उनकी भूत-प्रेतों की सेना को देखकर मैना बहुत डर गईं और उन्हें अपनी कन्या का पाणिग्रहण कराने में आनाकानी करने लगीं।
पीछे से जब उन्होंने शंकरजी का करोड़ों कामदेवों को लजाने वाला सोलह वर्ष की अवस्था का परम लावण्यमय रूप देखा तो वे देह-गेह की सुधि भूल गईं और शंकर पर अपनी कन्या के साथ ही साथ अपनी आत्मा को भी न्योछावर कर दिया।
हर-गौरी का विवाह आनंदपूर्वक संपन्न हुआ। हिमाचल ने कन्यादान दिया। विष्णु भगवान तथा अन्यान्य देव और देव-रमणियों ने नाना प्रकार के उपहार भेंट किए। ब्रह्माजी ने वेदोक्त रीति से विवाह करवाया। सब लोग अमित उछाह से भरे अपने-अपने स्थानों को लौट गए।
हर हर महादेव
जय जगदंबे

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महा शिवरात्रि व्रत विधि
Maha Shivratri Vrat Vidhi

महा शिवरात्रि व्रत विधि (Maha Shivratri)
भगवान शिव की पूजा-वंदना करने के लिए प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि (मासिक शिवरात्रि) को व्रत रखा जाता है। लेकिन सबसे बड़ी शिवरात्रि फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी होती है। इसे महाशिवरात्रि भी कहा जाता है। वर्ष 2017 में महाशिवरात्रि का व्रत 24 फरवरी को रखा जाएगा।

शिवरात्रि व्रत विधि (Shivratri Vrat Vidhi in Hindi)

गरुड़ पुराण के अनुसार शिवरात्रि से एक दिन पूर्व त्रयोदशी तिथि में शिव जी की पूजा करनी चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके उपरांत चतुर्दशी तिथि को निराहार रहना चाहिए। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव को जल चढ़ाने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग को पंचामृत से स्नान कराकर "ऊं नमो नम: शिवाय" मंत्र से पूजा करनी चाहिए। इसके बाद रात्रि के चारों प्रहर में शिवजी की पूजा करनी चाहिए और अगले दिन प्रात: काल ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए।

गरुड़ पुराण के अनुसार इस दिन भगवान शिव को बिल्व पत्र अर्पित करना चाहिए। भगवान शिव को बिल्व पत्र बेहद प्रिय हैं। शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को रुद्राक्ष, बिल्व पत्र, भांग, शिवलिंग और काशी अतिप्रिय हैं।

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